Story in hindi : Fight Against Corona Virus(Covide-19)

Story in hindi : Fight Against Corona Virus(Covide-19) रिपोर्ट नेगेटिव आएगी ना ? Fight Against Corona Virus

अभी रात्रि के 11 बजे है,में सोने का प्रयत्न करती हूँ। मुझे विश्वास है कल जब मेरी पुनः जाँच होगी तो मेरी रिपोर्ट नेगेटिव आएगी क्योकि में अपने लिए नहीं,उन रोगियों की सेवा में फिर जल्दी जाना चाहती हूँ जिनकी रिपोर्ट पॉजिटिव है। सबकी सेवा करने के लिए आएगी ना मेरी रिपोर्ट नेगेटिव ?

............यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है। पात्र व् स्थान का नाम बदल दिया गया है।. . . . . . . . . . . . . . 

में बड़ी आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूँ कि कब मेरी कोरोना की रिपोर्ट नेगेटिव आ जाए। मुझे विश्वास है कि वह नेगेटिव आएगी ही। आज यहां आईसीयू के इस वार्ड में आइसोलेशन में मै बिस्तर पर लेटी हूँ। मुझे पूर्ण आशा है,विश्वास को मन में संजोकर मुझे कहीं कोई दर नहीं है।घबराहट और डर तो सिर्फ इस बात की है कि कहीं
विश्व में अधिक लोगो को यह कोरोना नामक घातक महामारी चपेट में न ले ले क्योकि ज्ञात इतिहास में इस प्रकार की महामारी कभी नहीं देखी गई।में जब प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही थी तब मैंने पढ़ा था की प्रत्येक कार्य का एक कारण अवश्य होता है और यदि उस कारण का पता लग जाए तो हम किसी भी प्रकार से उस कार्य को होने या ना होने देने का निश्चय कर सकते है। पर जब किसी कार्य का कारण ही पता नही हो तो क्या किया जाए ?
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ऐसे में जब तक उसका कारण पता न लगे तो उसका इलाज भी तो संभव नहीं होता है। तो फिर अगल रहना, तो अपने आप को आइसोलेशन में रखना उस घातक कोरोना वायरस नामक राक्षस की चेन को तोडना ही एक मात्र उपाय है। आप सोच रहे होंगे की में बोर करने वाली बात कर रही हूँ  तो में आपको थोड़ा पीछे ले चलती हूँ।
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'मेरा नाम वत्सला है। मैंने अपने कॉलेज में रेडक्रॉस नामक संगठन में काम किया था और उसका इतिहास भी देखा था। युद्ध और महामारी के समय किस प्रकार नर्स अपना दुःख दर्द भूल कर मानवता की बचाव एवं उनकी सेवा में लग जाती थी। तभी मैंने उसी समय मन में ठान लिया था की चुनुँगी तो सिर्फ,सिर्फ यही नोबल प्रोफेशनल। इसमे मेरे माता-पिता ने भी साथ दिया। 
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मै बताती चलूँ मै एक छोटे से गॉव से हूँ। मेरे परिजनों ने बढ़ी कठनियो से मेरी नर्सिंग की फीस जमा करवाई क्योकि घर की स्थिति ऐसी नहीं थी की पुरे कोर्स की फीस जमा करवा सके। मन में उल्लास ले मां का आभार कर अपने गॉव से दो सौ किलोमीटर दूर नर्सिंग कॉलेज में प्रवेश लिया। नर्सिंग की प्रत्येक परीक्षा में अव्वल नम्बर से पास करती थी,फिर इंटर्नशिप में मैंने जानबूझकर नाईट शिफ्ट ली कर्तव्य का जज्बा कमजोर ना पड़ जाए। फिर तो स्टाइपंड भी  मिलने लगा। 
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प्रशिक्षण के दौरान ही मुझे है कि एक बार एक जिले में बाढ़ आई तो कॉलेज से मेडिकल टीम का सदस्य बनाये जाने के लिए नाम मांगे गए। मैंने सबसे पहले अपना हाथ खड़ा किया। बाढ़ से बचाए गए लोगो की सेवा में सुश्रुषा में पवित्र आनंद आया था। प्रशिक्षण के समय ही मुझे प्राचार्य प्रशंसा में 'फ्लोरेंस नाइटेंगल 'कहने  थे। 
इससे दुगना उत्साह संचरित हो जाता था। 
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प्रशिक्षण के दौरान विशेष रूप से मैंने 'संक्रमण के रोगियों की देखभाल विषय 'इच्छा से चुना। प्रशिक्षण के समाप्त होते-होते सरकारी रिक्तियों की विज्ञापन निकली। तुरंत ही फॉर्म भर दिया,नर्स का परिधान और रोगियों का सेवा का जूनून हृयद में ज्वार की तरह ठाठें मार रहा था।रिजल्ट आते ही घर में खुशियों ने अपनी मोंगरे की पोटली खोल दी। जिला अस्पताल में नियुक्त हो गई,वही स्टाफ कॉर्टर में रहने लगी। 
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हप्ते पंद्रह दिन में गॉव आती। अब घर पर मेरी विवाह की बात चलने लगी थी। एक दिन माँ का फ़ोन आया कि 'बेटी,चार दिन की छुट्टी लेकर आ जाओ।'मै जान गई थी। माँ ने इतना ही कहा 'तूने कोई लड़का तो पसंद नहीं कर रखा है 'मेरे ना कहते ही संतुस्ट कारक भाव से माँ ने कहा 'तुझे लड़के वाले देखने आना चाहते है परसों,तू कल सुबह ही चली आ।'
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में ड्यूटी से छुट्टी ले रवाना हो,ट्रेन में भविष्य के सपने देखते गॉव आ गई। दुसरे दिन स्वयं को सवांरने का प्रयास कर रही थी कि मेरे अस्पातल से मेरे मोबाइल पर फ़ोन आया 'इमरजेंसी है,छुट्टी रदद् की जाती है,कोरोना वायरस का कहर है। ड्यूटी पर लौटें। भविष्य की सुनहरे सपनों को तह बनाकर मस्तिष्क के एक कोने में सुरक्षित रख,माँ को 'अगले सप्ताह तक आती हूँ' बोल कर ट्रेन पकड़ ली। 
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कोरोना वायरस को महामारी अर्थात 'पेंडेमिक' घोषित कर दिया गया था। अस्पताल पहुंची तो भयानक मंजर !कुछ रोगियों में कोरोना पॉजिटिव के लक्षण नजर आ गए थे,उन्हें तुंरत अन्य से अलग कर दिया गया। क्योकि यह रोग संक्रमण और संपर्क से फैलता है। तो संक्रमित रोगियों की सेवा करें कौन ? उनके पास जाए कौन ? मै तत्परता से बोली 'डॉक्टर सर ! मै कोरोना पॉजिटिव मरीजों की सेवा करुँगी।'
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ऐसा सुनते ही सबके चहेरे पर प्रशंसा के भाव,पर मेरे मन में अपार संतुस्टि। बचाव के सभी एहतियाती उपाय ,सैनिटाइजर,मास्क आदि से लैस हो मै लग गई मनोयोग से सभी कोरोना पॉजिटिव रोगियों की सेवा में दिन-रात। मेरे आखों में तीसरे दिन खुशी के आंसू छलक पड़े जब उन में से पांच रोगी ठीक हो गए थे। उनकी रिपोर्ट नेगेटिव आई तो में बाकि रोगियों की सेवा में मनोयोग से जुट गई। 
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छठे दिन अचानक मुझे सांस लेने में तकलीफ होने लगी। गले में खरास,थोड़ा ठिठुरन,देखा तो हल्का बुखार भी। जांच की गई। 'कोरोना पॉजिटिव ' हो गई थी !मेरी आँखे जैसे पत्थर की हो गई। इसलिए नहीं की मेरी रिपोर्ट पोजेटिव थी बल्कि इसलिए की में रोगियों की सेवा नहीं कर पाऊँगी। 
मै अभी आइसोलेशन में हूँ। पता लगा है की गॉव में मेरे दादा-दादी ,माता-पिता,और भाई-बहन,सबको अन्य जगह आइसोलेशन में जांच के लिए भेज दिया गया है। जरुरी है की ऐसे परिजनों को जांच के लिए अलग रखना चाहिए ताकि इस कोरोना नामक राक्षस की चेन टूटे। अपनी मौत मरे ये कोरोना। 
अभी रात्रि के ग्यारह बजे है ,में सोने का प्रयत्न करती हूँ। आप भी घर में ही रहें ,पूरी नींद लें। मुझे विश्वास है कल जब मेरी पुनः जांच होगी तो मेरी रिपोर्ट नेगेटिव आएगी क्योकि में अपने लिए नहीं,उनकी सेवा में फिर से जाना चाहती हूँ जिनकी रिपोर्ट पॉजिटिव है। सब की सेवा करने के लिए मेरी रिपोर्ट नेगेटिव आएगी। आएगी ना?

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